You are here: Home » Chapter 35 » Verse 13 » Translation
← Sura 35 →
← Aya 13 →
13
يولِجُ اللَّيلَ فِي النَّهارِ وَيولِجُ النَّهارَ فِي اللَّيلِ وَسَخَّرَ الشَّمسَ وَالقَمَرَ كُلٌّ يَجري لِأَجَلٍ مُسَمًّى ۚ ذٰلِكُمُ اللَّهُ رَبُّكُم لَهُ المُلكُ ۚ وَالَّذينَ تَدعونَ مِن دونِهِ ما يَملِكونَ مِن قِطميرٍ

फ़ारूक़ ख़ान & नदवी

वही रात को (बढ़ा के) दिन में दाख़िल करता है (तो रात बढ़ जाती है) और वही दिन को (बढ़ा के) रात में दाख़िल करता है (तो दिन बढ़ जाता है और) उसी ने सूरज और चाँद को अपना मुतीइ बना रखा है कि हर एक अपने (अपने) मुअय्यन (तय) वक्त पर चला करता है वही खुदा तुम्हारा परवरदिगार है उसी की सलतनत है और उसे छोड़कर जिन माबूदों को तुम पुकारते हो वह छुवारों की गुठली की झिल्ली के बराबर भी तो इख़तेयार नहीं रखते